मै खुद से बेखबर
तेरी जानिब
ह़ो चला था रुखसत
खामोशियों का शोर
हर ओर
कानों के पर्दों को चीरता
चला जाता ह़ो जैसे
तुमसे फासला भी बढ़ता
जा रहा ह़ो जैसे
पर मेरे कदम भी
बस बढ़ चले है ऐसे
साँसों की डोर भी
कब सिमट जाये किसे पता
मेरी ज़िन्दगी भी तो ह़ो चली है लापता
मै फिर भी तेरी ओर क्यों
बढ़ता चला जा रहा
मै ये भी फैसला नहीं कर पा रहा
न जाने ये वक़्त क्या बताएगा
कभी तो कोई रास्ता नया दिखायेगा
इसी उम्मीद में बढ़ता जा रहा हूँ
तेरी छोड़ी लकीर पर मै चलता जा रहा हूँ..
मै चलता जा रहा हूँ..
Tuesday, June 22, 2010
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